Monday, 17 March 2014

शेर "कुछ बे-सर पैर"






 शेर    "कुछ  बे-सर पैर"

इन्हे  शेर  कहना  मुझे  भी गवारा न हैं , चलिए  तुकबंदी ही मान लीजिए।
चलिए तुकबंदी न सही , बुरा न मानियेगा , होली तो है ही। 



For the rabbles of AAP

सुना था कहीं , आ रहा हैं अख़लाक़ का ग़दर शरिया बरसेंसगी , जा  रहा हैं मगरूर सा बदर देख रहा हुँ, अभी कम -ख्याली का नया  सहर खाकसार का  क्या,  वो तो दर बदर दर बदर 


For our Esteemed Politicians

मय्यत  पे  भी  मुस्कुराते हैं , तहज़ीब  को  भी  शरमाते है 
कौम- इ- हुकुमरान मेरे , इन्शानियत को  भी डरवाते हैं। 


हालत-इ-बदहवासी  देख  आप  यो न घबराइये 
रसूक  मेरे सियासतदानो  का  जो गौर फरमाइये 


Seems apt for me

शिकवा नहीं ज़माने सॆ , हमें  तो लुटा यारों ने 
तूफाँ  में  भी  ख़ड़े  रहे , उखड  गए बयारों  में। 

Totally unfit for Bhakts
मंज़िले बनी रहे जो  रह जाए थोड़े फासले 
रंजिशें मिटती रहे    टूटे  हमारे काफ़िले 

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